रविवासरीय हिंदुस्तान, 22 जुलाई 2012
शशि शेखर द्वारा राजेश खन्ना को इस रूप में याद किया गया
सुपर स्टार होने का अर्थ
कुछ महीने पहले टेलीविजन पर विज्ञापन देखा- एक कृषकाय व्यक्ति डायलॉग बोल रहा है- ‘मुझसे मेरे ‘फैन्स’ कोई नहीं छीन सकता बाबू मोशाय।’ शरद जोशी के नाटक के संवाद से मिलता-जुलता भाव मन में उभरा- समय किसी भी सुपर स्टार से बड़ा होता है। संवाद बोलने वाले कोई और नहीं राजेश खन्ना थे, पर मुझे वह विज्ञापन रुचिकर नहीं लगा। क्यों?
शायद इसलिए कि हम अक्सर मन में कुछ छवियों को इतने गहरे तक जगह दे देते हैं कि उन पर वक्त की जरा-सी धूल बर्दाश्त नहीं होती। मुझे याद है। बरसों पहले हम किसी हस्ती के यहां गए थे। उनकी पत्नी कभी मशहूर मॉडल और हीरोइन हुआ करती थीं। मैं उनसे मिलना चाहता था, पर तमाम इसरार के बावजूद वह बाहर नहीं निकलीं। बाद में पति महोदय ने बताया कि वह बिना मेकअप अपने दायरे से बाहर निकलना पसंद नहीं करतीं। उस दिन जब राजेश खन्ना को पंखे के उस विज्ञापन में देखा, तो मुझे हिंदी सिनेमा की वह पूर्व नायिका समझदार लगने लगी थी। मेकअप के बिना उनको देखना, यादों में स्थापित छवि को खंडित करना था। ‘सुपर स्टार’ की कृषकाया इसीलिए कष्टकारी थी, पर ‘फैन्स’ वाला डायलॉग गलत नहीं था। गए गुरुवार को राजेश खन्ना की अंतिम यात्रा में जो भीड़ उमड़ी, वह इस बात की तस्दीक करती थी कि उनके ‘फैन्स’ को उनसे कोई नहीं छीन सकता।
मैं राजेश खन्ना से कभी नहीं मिला, पर उनका मेरे जीवन में अहम हिस्सा है। पांचवीं या छठी कक्षा की बात है। किशोर होने की अनुभूति मन में पंख खोलने लगी थी। बगल के घर में दो दीदियां रहती थीं। दोनों की दोनों राजेश खन्ना की जबर्दस्त फैन। एक दिन देखता क्या हूं कि साप्ताहिक हिन्दुस्तान में राजेश खन्ना की बड़ी-सी तस्वीर छपी है और उनमें से एक दीदी निहारते-निहारते फोटो को अपने होठों से लगा लेती है। यकीन जानिए, उस तरह की जलन का अहसास उससे पहले कभी नहीं हुआ था। यह तो राजेश खन्ना के जादू की हलकी-सी झलक है। महिलाओं में किसी स्टार के प्रति ऐसी जानलेवा दीवानगी बाद में कभी नहीं देखी गई।
हमारी पीढ़ी के लोग उनकी फिल्मों को देखते और गाने गुनगुनाते बड़े हुए। इनके बहुत से शब्द मुहावरे की मानिंद हम लोगों के दिल-ओ-दिमाग में पैबस्त हो गए थे। हालांकि, हम उनका अर्थ भी नहीं जानते थे। रूप कैसे मस्ताना हो सकता है या प्यार क्यों दीवाना हो सकता है, या फिर किसी को सपनों की रानी भी कहा जा सकता है? ऐसे प्रश्न उनकी फिल्मों के गानों को सुन-सुनकर मन में उमड़ते-घुमड़ते थे। जवाब के लिए अपनी उम्र का इंतजार करना था।
उस वक्त वह करियर के एवरेस्ट की ओर थे, बॉलीवुड की छत पर कब्जा करना आसान नहीं था। वह समय हिंदी सिनेमा की शास्त्रीय तिकड़ी का था। एक तरफ ‘ट्रैजिडी किंग’ दिलीप कुमार थे, दूसरी तरफ ‘ग्रेट शोमैन’ राजकपूर और तीसरी ओर ‘सदाबहार’ देवानंद। यह त्रिमूर्ति ऐसा पैकेज थी, दर्शक जिसके बरसों-बरस से अभ्यस्त थे। बाकी सारे लोग इनकी नकल करके अपना काम चलाते थे। राजेंद्र कुमार को ‘जुबली कुमार’ जरूर कहा जाता था, पर इस त्रिमूर्ति के सामने उनकी आभा धुंधली लगती थी। बहुतों को वह दिलीप कुमार की नकल लगते थे। इसीलिए उन्हें ऐसे निर्माताओं का प्रश्रय हासिल होता था, जिनसे यूसुफ साहब किसी न किसी तरह दूरी बनाकर रखते थे। राजकपूर संगम में दिलीप को लेना चाहते थे, वह नहीं मिले, तो राजेंद्र कुमार से काम चला लिया।
यह भी मत भूलिए कि उस समय न इतनी फिल्में बनती थीं, न देश-विदेश में ऐसा विशाल दर्शक वर्ग होता था। न ही स्थापित लोग किसी नौजवान के लिए रास्ता छोड़ने के लिए तैयार थे। लता मंगेशकर के विरोधी आरोप लगाते हैं कि उन्होंने न केवल सैकड़ों प्रतिभावान गायिकाओं की राह रोकी, बल्कि अपनी सगी बहनों के रास्ते में भी रोड़े अटकाए। ऐसे माहौल में अमृतसर में जन्मे इस नौजवान के लिए रास्ता बनाना बेहद कठिन था, पर धुन के पक्के काका अभिनय की नई किताब लिखने को आतुर थे।
एक बार फिल्मों के किसी जानकार ने बताया था कि शुरुआती दिनों में निर्देशक ने उनसे कहा कि मां के लिए एक डायलॉग बोलिए। राजेश खन्ना का सवाल था कि मेरी मां की भूमिका निभाएगा कौन? जवाब में सवाल मिला, इससे आपको क्या मतलब? आप तो बस कल्पना कीजिए और संवाद बोल दीजिए। राजेश खन्ना ने उन्हें समझाया था- यह जानना बेहद जरूरी है, क्योंकि हर अभिनेत्री की अपनी एक स्टाइल होती है। उसके बच्चे में भी उसका अंश झलकना चाहिए। अभिनय के विद्यार्थी अगर इस प्रकरण के बारे में न जानते हों, तो इसे कृपया याद कर लें, जीवन भर उनके काम आएगा।
एक बार फिल्मों के किसी जानकार ने बताया था कि शुरुआती दिनों में निर्देशक ने उनसे कहा कि मां के लिए एक डायलॉग बोलिए। राजेश खन्ना का सवाल था कि मेरी मां की भूमिका निभाएगा कौन? जवाब में सवाल मिला, इससे आपको क्या मतलब? आप तो बस कल्पना कीजिए और संवाद बोल दीजिए। राजेश खन्ना ने उन्हें समझाया था- यह जानना बेहद जरूरी है, क्योंकि हर अभिनेत्री की अपनी एक स्टाइल होती है। उसके बच्चे में भी उसका अंश झलकना चाहिए। अभिनय के विद्यार्थी अगर इस प्रकरण के बारे में न जानते हों, तो इसे कृपया याद कर लें, जीवन भर उनके काम आएगा।
इंसानी व्यवहार की इसी बारीक समझ ने उन्हें अपने व्यक्तित्व और अभिनय में ऐसा कॉकटेल बनाने में मदद की, जो दिलीप, देव और राजकपूर की त्रिमूर्ति का मिश्रण था। उन्होंने चाल-ढाल और अदाओं में देवानंद को पछाड़ा, तो अनेक हास्य भूमिकाओं में राजकपूर और दिलीप कुमार की बराबरी की। आप आनंद के दृश्य याद कीजिए। हास्य, करुणा और चपलता के तमाम भाव एक के बाद एक मिल जाएंगे। अपनी असल जिंदगी में भी राजेश खन्ना ने उन लोगों का साथ कभी नहीं छोड़ा, जो उनके करियर में मददगार साबित हुए थे। किशोर कुमार का करियर जब ढलान पर आया, तो राजेश खन्ना ने तमाम संगीतकारों से गुजारिश की कि वह सिर्फ उनकी ही आवाज का इस्तेमाल करना चाहेंगे। आरडी बर्मन के भी छांव भरे दिनों में काका उनके साथ नजर आते थे। हर निर्माता से उनका आग्रह होता था कि वे गीत आनंद बख्शी से लिखवाएं, जबकि उन दिनों उर्दू शायरी के तमाम दिग्गज फिल्मी बाजार में बोली के इंतजार में खड़े थे।
जो शख्स दूसरों का इतना मददगार था, उसे अपनी जिंदगी के अंधेरों में वैसी मदद नहीं हासिल हुई, जिसकी दरकार थी। अस्सी के दशक में अपनी दूसरी पारी के अवसान के बाद वह राजनीति में आए, चुनाव भी जीता पर बॉलीवुड के सहयोगियों और सियासत के महारथियों में जमीन-आसमान का अंतर होता है। मुझे नहीं लगता कि राजेश खन्ना सियासत सुखी मन से छोड़कर गए। अब सिर्फ राजनीति ही क्यों, परिवार, सिने जगत और निजी रिश्तों में उन्हें तमाम बार ऐसा ही अहसास हुआ।
यह अलग बात है कि हम राजेश खन्ना को हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार के रूप में जानते रहे हैं, जानते रहेंगे। पता नहीं ‘आनंद’ की तरह उनकी गिरती हालत ने पहले से संकेत दिया था या नहीं कि सांसों का सिलसिला थमने वाला है? उस फिल्म का आखिरी संवाद याद आ रहा है - बाबू मोशाय,..जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ है जहांपनाह। उसे न तो आप बदल सकते हैं, न मैं। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिसकी डोर ऊपर वाले की उंगली से बंधी है। कब, कौन, कैसे उठेगा, ये कोई नहीं बता सकता है।
यकीनन, ‘आशीर्वाद’ से अंतिम विदा लेने के बाद बैकग्राउंड से इस तरह का डायलॉग नहीं सुना गया होगा, पर यह सच है कि कुछ लोग रंगमंच की कठपुतलियों का रोल अदा करते-करते उनमें ऐसे प्राण फूंक देते हैं कि इतिहास बन जाता है। राजेश खन्ना उनमें से एक थे।
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