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Monday, July 30, 2012




काका के 'आशीर्वाद' पर डिंपल का अधिकार नहीं!



बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना ने अपनी पत्नी डिंपल कपाड़िया को अपनी संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया. राजेश खन्ना पूरी संपत्ति अपनी दोनों बेटियों के नाम कर गए हैं.

ट्विंकल खन्ना कुमार और रिंकी खन्ना के नाम 'काका' ने अपनी पूरी संपत्ति कर दी, जबकि काफी समय से अलग रह रहीं पत्नी डिंपल कपाड़िया को काका ने अपनी संपत्ति में से कुछ भी नहीं दिया है.

खबरों के मुताबिक, राजेश खन्ना ने वसीयत में निवेश की जानकारी और तमाम बैंक अकाउंट संचालित करने का हक अपनी दोनों बेटियों ट्विंकल खन्ना और रिंकी को दे दिया था. वसीयत डिंपल कपाड़िया, दामाद अक्षय कुमार, कुछ खास दोस्तों और फैमिली डॉक्टर दिलीप वालवकर के सामने पढ़ी गई.

वसीयतनामा में राजेश खन्ना ने अपनी पूर्व प्रेमिका अनीता आडवाणी का कहीं कोई जिक्र नहीं किया है. इस लिहाज से अनीता का दावा भी काका की जायदाद पर गलत साबित हो गया है.

वसीयतनामा के पढ़े जाने के बाद अब काका की जायदाद को लेकर किसी भी तरह का विवाद खत्म होता दिख रहा है.

(आज तक)


Thursday, July 26, 2012


मरने से पहले फैंस के लिए मैसेज रिकॉर्ड कर गए थे राजेश खन्‍ना


मुंबई. गुजरे जमाने के सुपर स्‍टार राजेश खन्‍ना की अस्थियां गंगा में विसर्जित की जाएंगी। इसके लिए गुरुवार को खन्‍ना के परिवार के सभी लोग हरिद्वार रवाना होंगे। हरिद्वार जाने वालों में राजेश खन्‍ना की पत्‍नी डिंपल कपाडि़या, बेटी ट्व‍िंकल और रिंकल के अलावा दामाद अक्षय कुमार भी होंगे। 
वहीं, राजेश खन्‍ना अपने परिवारवालों, दोस्‍तों और प्रशंसकों के लिए खास रिकॉर्डेड मैसेज छोड़ गए हैं। 40 साल पहले 'आनंद' फिल्‍म में राजेश खन्‍ना ने बाबू मोशाय (अमिताभ बच्‍चन) के लिए रिकॉर्डेड मैसेज छोड़ा था। असल जिंदगी में इस सुपरस्‍टार का रिकॉर्डेड मैसेज उनके चौथा के मौके पर सुनाया गया।
राजेश खन्‍ना का मैसेज इस तरह है- मेरे प्‍यारे दोस्‍तों, भाइयों और बहनों। नोस्‍टैल्जिया में रहने की आदत नहीं है मुझे। हमेशा भविष्‍य के बारे में ही सोचना पड़ता है। जो दिन गुजर गया है, बीत गया है, उसका क्‍या सोचना, लेकिन जब जाने पहचाने चेहरे अनजान से एक महफिमुझे ऐसा लग रहा था कि कोर्ट मार्शल हो रहा है। जैसे ये बंदूक निकालेंगे और मुझे मार देंगे। मैंने कहा कि डायलॉग तो याद है लेकिन ये जो डायलॉग है, ये आपने नहीं बताया कि इसका कैरेक्‍टराइजेशन क्‍या है कि ये हीरो जो है वो अपनी मां को बताता है कि मैं एक नाचनेवाली से शादी करना चाहता हूं और उसको तेरी घर की बहू बनाना चाहता हूं। मैंने कहा, आपने ना कैरेक्‍टर बताया मां का, ना हीरो का कि भई अमीर है, गरीब है, मां गरीब है, मां सख्‍त, कड़क है, नरम है, मिडिल क्‍लास है, आदमी पढ़ा लिखा या अनपढ़ है? तो चोपड़ा साहब ने झट से कहा कि आप थियेटर से हो?ल में मिलते हैं तो यादें वापस ताजा हो जाती हैं।





मेरा जन्‍म थियेटर से हुआ। मैं आज जो कुछ भी हूं ये स्‍टेज, ये थियेटर की बदौलत हूं। मैं जब फिल्‍मों में आया तो मेरा कोई गॉडफादर नहीं था। कोई रिश्‍तेदार नहीं थे। कोई सिर पर हाथ रखने वाला नहीं था। मैं यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स फिल्‍मफेयर टैलेंट कॉन्‍टेस्‍ट के जरिये आया। हमको टाइम्‍स ऑफ इंडिया में बुलाया गया था। वहां पर बड़े बड़े प्रोड्यूसर्स थे। चाहे वो चोपड़ा साहब थे, बिमल रॉय थे, शक्ति सामंत थे, बहुत सारे थे। उन्‍होंने कहा कि हमने आपको डायलॉग भेजा है, वो याद किया आपने? मैं सामने बैठा था और वो एक बड़ी सी टेबल में लाइन में बैठै थे।




हां जी. मैंने कहा, डायलॉग तो आपने भेज दिया किस तरह मां को कन्‍विंस करना है, डायलॉग बोलना है, आपने कैरेक्‍टराइजेशन नहीं बताया। ये तो कोई स्‍टेज का एक्‍टर ही बोल सकता है। तो बोले ठीक है, अच्‍छा है, तुम कोई अपना ही डायलॉग सुनाओ। अब काटो तो खून नहीं, पसीना छूट रहा था। मैंने कहा, क्‍या डायलॉग बोलूं, मेरे सामने बड़े बड़े लोग, इनकी सब पिक्‍चर 10-10 बार देखी है, प्रोड्यूस-डायरेक्‍ट की हुई। जो डायलॉग, जिसकी वजह से मैं फिल्‍मों में आया, मुझे जीपी सिप्‍पी ने चांस दिया 40 साल पहले, 'हां मैं कलाकार हूं, हां मैं कलाकार हूं, क्‍या करोगे मेरी कहानी सुनकर'

दोस्‍तों आपका एक हिस्‍सेदार मैं भी हूं और जैसे मैंने पहले भी कहा कि आप अपना कीमती वक्‍त निकालकर, आपका ये प्‍यार था कि आप मौजूद हुए और इतनी भारी संख्‍या में... मैं यहीं कहूंगा कि बहुत-बहुत शुक्रिया, थैंक यू और मेरा बहुत बहुत सलाम।...


Monday, July 23, 2012


राजेश खन्ना के बारे में 50 रोचक जानकारियां


वैबदुनिया में प्रकाशित

1) जिस तरह से आज टीवी के जरिये टैलेंट हंट किया जाता है, कुछ इसी तरह काम 1965 यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स और फिल्मफेअर ने किया था। वे नया हीरो खोज रहे थे। फाइनल में दस हजार में से आठ लड़के चुने गए थे, जिनमें एक राजेश खन्ना भी थे। अंत में राजेश खन्ना विजेता घोषित किए गए। 

2) राजेश खन्ना का वास्तविक नाम जतिन खन्ना है। अपने अंकल के कहने पर उन्होंने नाम बदल लिया। 

3) 1969 से 1975 के बीच राजेश ने कई सुपरहिट फिल्में दीं। उस दौर में पैदा हुए ज्यादातर लड़कों के नाम राजेश रखे गए।

4) फिल्म इंडस्ट्री में राजेश को प्यार से काका कहा जाता था। जब वे सुपरस्टार थे तब एक कहावत बड़ी मशहूर थी- ऊपर आका और नीचे काका। 

5) 29 दिसम्बर 1942 को जन्मे राजेश खन्ना स्कूल और कॉलेज जमाने से ही एक्टिंग की ओर आकर्षित हुए। उन्हें उनके एक नजदीकी रिश्तेदार ने गोद लिया था और बहुत ही लाड़-प्यार से उन्हें पाला गया। 

6) राजेश ने फिल्म में काम पाने के लिए निर्माताओं के दफ्तर के चक्कर लगाए। स्ट्रगलर होने के बावजूद वे इतनी महंगी कार में निर्माताओं के यहां जाते थे कि उस दौर के हीरो के पास भी वैसी कार नहीं थी। 

7) प्रतियोगिता जीतते ही राजेश का संघर्ष खत्म हुआ। सबसे पहले उन्हें ‘राज’ फिल्म के लिए जीपी सिप्पी ने साइन किया, जिसमें बबीता जैसी बड़ी स्टार थीं।

8) राजेश की पहली प्रदर्शित फिल्म का नाम ‘आखिरी खत’ है, जो 1966 में रिलीज हुई थी।

9) 1969 में रिलीज हुई आराधना और दो रास्ते की सफलता के बाद राजेश खन्ना सीधे शिखर पर जा बैठे। उन्हें सुपरस्टार घोषित कर दिया गया और लोगों के बीच उन्हें अपार लोकप्रियता हासिल हुई।

10) सुपरस्टार के सिंहासन पर राजेश खन्ना भले ही कम समय के लिए विराजमान रहे, लेकिन यह माना जाता है कि वैसी लोकप्रियता किसी को हासिल नहीं हुई जो राजेश को ‍हासिल हुई थी।

11) लड़कियों के बीच राजेश खन्ना बेहद लोकप्रिय हुए। लड़कियों ने उन्हें खून से खत लिखे। उनकी फोटो से शादी कर ली। कुछ ने अपने हाथ या जांघ पर राजेश का नाम गुदवा लिया। कई लड़कियां उनका फोटो तकिये के नीचे रखकर सोती थी। 

12) स्टुडियो या किसी निर्माता के दफ्तर के बाहर राजेश खन्ना की सफेद रंग की कार रुकती थी तो लड़कियां उस कार को ही चूम लेती थी। लिपिस्टिक के निशान से सफेद रंग की कार गुलाबी हो जाया करती थी। 

13) निर्माता-निर्देशक राजेश खन्ना के घर के बाहर लाइन लगाए खड़े रहते थे। वे मुंहमांगे दाम चुकाकर उन्हें साइन करना चाहते थे। 

14) पाइल्स के ऑपरेशन के लिए एक बार राजेश खन्ना को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। अस्पताल में उनके इर्दगिर्द के कमरे निर्माताओं ने बुक करा लिए ताकि मौका मिलते ही वे राजेश को अपनी फिल्मों की कहानी सुना सके।

15) राजेश खन्ना को रोमांटिक हीरो के रूप में बेहद पसंद किया गया। उनकी आंख झपकाने और गर्दन टेढ़ी करने की अदा के लोग दीवाने हो गए।

16) राजेश खन्ना द्वारा पहने गए गुरु कुर्त्ते खूब प्रसिद्ध हुए और कई लोगों ने उनके जैसे कुर्त्ते पहने। 

17) आराधना, सच्चा झूठा, कटी पतंग, हाथी मेरे साथी, मेहबूब की मेहंदी, आनंद, आन मिलो सजना, आपकी कसम जैसी फिल्मों ने आय के नए रिकॉर्ड बनाए। 

18) आराधना फिल्म का गाना ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू...’ उनके करियर का सबसे बड़ा हिट गीत रहा। 

19) आनंद फिल्म राजेश खन्ना के करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी जा सकती है, जिसमें उन्होंने कैंसर से ग्रस्त जिंदादिल युवक की भूमिका निभाई। 

20) राजेश खन्ना की सफलता के पीछे संगीतकार आरडी बर्मन और गायक किशोर का अहम योगदान रहा। इनके बनाए और राजेश पर फिल्माए अधिकांश गीत हिट साबित हुए और आज भी सुने जाते हैं। किशोर ने 91 फिल्मों में राजेश को आवाज दी तो आरडी ने उनकी 40 फिल्मों में संगीत दिया। 

21) अपनी फिल्मों के संगीत को लेकर राजेश हमेशा सजग रहते थे। वे गाने की रिकॉर्डिंग के वक्त स्टुडियो में रहना पसंद करते थे और अपने सुझावों से संगीत निर्देशकों को अवगत कराते थे। 

22) मुमताज और शर्मिला टैगोर के साथ राजेश खन्ना की जोड़ी को काफी पसंद किया गया। मुमताज के साथ उन्होंने 8 सुपरहिट फिल्में दी।

23) मुमताज ने शादी कर फिल्म को अलविदा कहने का मन बना लिया। उनके इस निर्णय से राजेश को बहुत दु:ख हुआ। 

24) शर्मिला और मुमताज, जो कि राजेश की लोकप्रियता की गवाह रही हैं, का कहना है कि लड़कियों के बीच राजेश जैसी लोकप्रियता बाद में उन्होंने कभी नहीं देखी। 

25) आशा पारेख और वहीदा रहमान जैसी सीनियर एक्ट्रेस के साथ भी उन्होंने काम किया। खामोशी में राजेश को वहीदा के कहने पर ही रखा गया।


26) गुरुदत्त, मीना कुमारी और गीता बाली को राजेश खन्ना अपना आदर्श मानते थे।

27) जंजीर और शोले जैसी एक्शन फिल्मों की सफलता और अमिताभ बच्चन के उदय ने राजेश खन्ना की लहर को थाम लिया। लोग एक्शन फिल्में पसंद करने लगे और 1975 के बाद राजेश की कई रोमांटिक फिल्में असफल रही। 

28) कुछ लोग राजेश खन्ना के अहंकार और चमचों से घिरे रहने की वजह को उनकी असफलता का कारण मानते थे। बाद राजेश खन्ना ने कई फिल्में की, लेकिन सफलता की वैसी कहानी वे दोहरा नहीं सके। 

29) राजेश ने उस समय कई महत्वपूर्ण फिल्में ठुकरा दी, जो बाद में अमिताभ को मिली। यही फिल्में अमिताभ के सुपरस्टार बनने की सीढ़ियां साबित हुईं। यही राजेश के पतन का कारण बना।

30) राजेश के स्वभाव की वजह से मनमोहन देसाई, शक्ति सामंत, ऋषिकेश मुखर्जी और यश चोपड़ा ने उन्हें छोड़ अमिताभ को लेकर फिल्म बनाना शुरू कर दी। 

31) अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना को प्रतिद्वंद्वी माना जाता था। दोनों ने आनंद और नमक हराम नामक फिल्मों में साथ काम किया है। इन दोनों फिल्मों में राजेश के रोल अमिताभ के मुकाबले सशक्त हैं। 

32) यह प्रतिद्वंद्विता तब और गहरा गई जब एक ही कहानी पर राजेश को लेकर ‘आज का एमएलए रामअवतार’ और अमिताभ को लेकर ‘इंकलाब’ शुरू की गई। बाद में दोनों ही फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खास असर नहीं छोड़ पाई। 

33) रोमांटिक हीरो राजेश दिल के मामले में भी रोमांटिक निकले। अंजू महेन्द्रू से उनका जमकर अफेयर चला, लेकिन फिर ब्रेकअप हो गया। ब्रेकअप की वजह दोनों ने आज तक नहीं बताई है। बाद में अंजू ने क्रिकेट खिलाड़ी गैरी सोबर्स से सगाई कर सभी को चौंका दिया। 

34) राजेश खन्ना ने अचानक डिम्पल कपाड़िया से शादी कर करोड़ों लड़कियों के दिल तोड़ दिए। डिम्पल ने बॉबी फिल्म से सनसनी फैला दी थी। 

35) समुंदर किनारे चांदनी रात में डिम्पल और राजेश साथ घूम रहे थे। अचानक उस दौर के सुपरस्टार राजेश ने कमसिन डिम्पल के आगे शादी का प्रस्ताव रख दिया जिसे डिम्पल ठुकरा नहीं पाईं। शादी के वक्त डिम्पल की उम्र राजेश से लगभग आधी थी।

36) राजेश-डिम्पल की शादी की एक छोटी-सी फिल्म उस समय देश भर के थिएटर्स में फिल्म शुरू होने के पहले दिखाई गई थी। 

37) डिम्पल और राजेश की दो बेटी हैं ट्विंकल और रिंकी। डिम्पल और ‍राजेश में नहीं पटी, बाद में दोनों अलग हो गए। 

38) अलग होने के बावजूद मुसीबत में हमेशा डिम्पल ने राजेश का साथ दिया। हाल ही में वे बीमार हुए तो डिम्पल ने उनकी सेवा की। उनका चुनाव प्रचार ‍भी किया। 

39) अपनी साली सिम्पल कपाड़िया के साथ राजेश बतौर हीरो फिल्म ‘अनुरोध’ में नजर आए। 

40) राजीव गांधी के कहने पर राजेश राजनीति में आए। कांग्रेस (ई) की तरफ से कुछ चुनाव भी उन्होंने लड़े। जीते भी और हारे भी। लालकृष्ण आडवाणी को उन्होंने चुनाव में कड़ी टक्कर दी और शत्रुघ्न सिन्हा को हराया भी। बाद में उनका राजनीति से मोहभंग हो गया। 

41) राजेश खन्ना की लाइफ में टीना मुनीम भी आईं। एक जमाने में राजेश ने कहा भी था कि वे और टीना एक ही टूथब्रश का इस्तेमाल करते हैं। 

42) जीतेन्द्र और राजेश खन्ना स्कूल में साथ पढ़ चुके हैं।

43) राजेश खन्ना और उनकी बेटी ट्विंकल का एक ही दिन जन्मदिन आता है, 29 दिसंबर।

44) बहुत पहले ‘जय शिव शंकर’ फिल्म में काम मांगने के लिए राजेश खन्ना के ऑफिस में अक्षय कुमार गए थे। घंटों उन्हें बिठाए रखा और बाद में काका उनसे नहीं मिले। उस दिन कोई सोच भी नहीं सकता था कि यही अक्षय एक दिन काका के दामाद बनेंगे। 

45) अक्षय का कहना है कि वे बचपन से राजेश खन्ना के फैन रहे हैं। आराधना, अमर प्रेम और कटी पतंग उनकी पसंदीदा फिल्म है। 

46) कहा जाता है कि राजेश खन्ना ने बहुत सारा पैसा लॉटरी चलाने वाली एक कंपनी में लगा रखा था जिसके जरिये उन्हें बहुत आमदनी होती थी।

47) काका का कहना था कि वे अपनी जिंदगी से बेहद खुश थे। दोबारा मौका मिला तो वे फिर राजेश खन्ना बनना चाहेंगे और वही गलतियां दोहराएंगे।

48) अपने बैनर तले राजेश खन्ना ने ‘जय शिव शंकर’ नामक फिल्म शुरू की थी, जिसमें उन्होंने पत्नी डिम्पल को साइन किया। आधी बनने के बाद फिल्म रूक गई और आज तक रिलीज नहीं हुई। 

49) राजेश खन्ना ने श्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेअर पुरस्कार तीन बार जीता और चौदह बार वे नॉमिनेट हुए। 

50) वर्तमान दौर के सुपरस्टार शाहरुख खान का कहना है कि राजेश ने अपने जमाने में जो लोकप्रियता हासिल की थी, उसे कोई नहीं छू सकता है। 18 जुलाई 2012 को काका ने अपने घर में आखिरी सांस ली।

काका को बस पुष्पा की श्रद्धांजलि सच्ची


आलोक पुराणिक - नवभारत टाइम्‍स में

राजेश खन्नाजी (काका) चले गए। श्रद्धांजलियां सभी की हैं। पर मैं दिल पे हाथ रखकर कहता हूं कि दिल से, दिल के बहुत ही गहरे कोने से निकली आह से बिंधी हुई आत्मीय श्रद्धांजलियां सिर्फ उन आदरणीयाओं की हैं, जिनकी उम्र अभी करीब साठ से पैंसठ के बीच की है। 

ये आदरणीयाएं 1970 में करीब बीस-पचीस साल की रही होंगी। इन्होंने राजेश खन्ना का जादू सिर्फ सुना नहीं, देखा है। जिया है। पचास साल से ऊपर के पुरुषों की सारी श्रद्धांजलियों को सच्चा ना माना जाए। इनमें से अधिकतर काका से जलते थे। 

किसी की बेटी पुष्पा काका की फोटू से शादी का प्लान रखती थी। किसी की बहन पुष्पा किताब में काका का फोटू रखती थी। किसी की बीवी काका को देखकर कल्पना करती थी कि हाय मेरा वाला भी ऐसा होता। काका धमाका थे। सुनने देखने से ताल्लुक रखते थे।

काका से पहले भी प्रेम था। काका से पहले देवदास दिलीप कुमार थे। ऐसे प्रेमी, जिनकी महानता के तले पारो दब सकती थीं। ऐसे प्रेमी, जिनसे चंद्रमुखी पूरे तौर पर सहज ना हो पाती थीं। अपनी महानता की खाइयों में चुप मौत यानी प्रेम का एक आयाम देवदास था। देवदास पर रोया जा सकता था पर काका के साथ डांस किया जा सकता था। काका के बाद अमिताभ बच्चन जी के युग में प्रेम रहा फिल्मों में, पर एक ड्यूटी की तरह। लव की वह ब्यूटी जा चुकी थी। 

आदरणीयाओं के दुख में पूरा देश शरीक है अच्छी बात है। पर आदरणीयाओं का जो दुख है, उसे वो ही समझ सकती हैं। मैं चार साल पहले शिमला जाने वाली टॉय ट्रेन में कालका से जा रहा था। सामने सीट पर एक वृद्ध प्रोफेसर आदरणीया थीं। टॉय ट्रेन चली तो आदरणीया ने पूछा - जी यह वही ट्रेन है, ट्रेन टै्रक के साथ वही सड़क है ना जिसमें आराधना फिल्म के उस फेमस गीत की शूटिंग हुई थी - मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू। 

साठ वर्षीय आदरणीया की आंखें ये सवाल पूछते हुए एकदम बीस बरस की बालिका जैसी हो गई थीं। अंदाज कुछ यूं कि इस सवाल का जवाब हां में ही चाहिए। मुझे मालूम था कि उस गीत की शूटिंग शिमला में नहीं, दार्जिलिंग में हुई थी पर सच बोलने की हिम्मत ना पड़ी। मैंने कहा - जी बिलकुल, ठीक यहीं पर हुई है। 

कालका से शिमला के रास्ते में जैसे वह आदरणीया खो ही गईं, वह पुष्पा बनीं ट्रेन, पहाड़, सड़क में जैसे काका के साथ ही थीं। काका का ये जलवा तब था, जब काका का जलवा बचा ही नहीं था। सारी आदरणीयाओं और पुष्पाओं की तरफ से काका को श्रद्धांजलि। पचास साल की उम्र से ज्यादा के पुरुषों की अधिकतर श्रद्धांजलियां फर्जी हैं। जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि उनमें से अधिकतर काका से जलते थे।


बॉलिवुड की पाठशाला थे राजेश खन्ना


तरुण विजय  नवभारत टाइम्‍स में

जिस जीवन में वास्तविकता से अधिक महत्त्व परदे की कृत्रिम अभिनय क्षमता का हो, जहां व्यक्ति किसी और की कहानी, किसी और के बनाये संगीत और एक व्यावसायिक निर्देशन में रुपहले परदे पर वह जीवन जिए जिसका उसके अपने जीवन से दूर-दूर का सम्बन्ध न हो तो उस व्यक्ति को क्या हम सृजन धर्मी कहकर महानता का दर्जा दे सकते हैं? क्या उसका हमारे जीवन में कोई यथार्थ महत्व होता है? हम उस व्यक्ति के जीवन और उसकी मृत्यु में संसार की किन जटिलताओं की परिभाषा खोजें?

सुपर स्टार राजेश खन्ना की मृत्यु और उससे उपजे शोक ने यह प्रश्न भी खड़े किये हैं।

इसका एक ही उत्तर है कि यदि जीवन केवल रोटी, कपड़ा और मकान नहीं है तो उसमें अध्यात्म और कला के बिना भी अधूरापन रहता है। मनुष्य केवल भौतिक सुख सुविधा का गुलाम नहीं, उसका मन, आत्मा और आतंरिक संवेदनाएं दर्शन और श्रव्य जगत से परे भी कुछ प्राप्त करने की चाह रखती हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो भरत मुनि का नाट्य शास्त्र न जन्मता और नृत्य, कला तथा सौंदर्य सृष्टि हमारे मंदिरों में उपासना का अभिन्न अंग न बनती।

यही सर्जना है जो कभी किसी मृत्युंजय उपन्यास में झलकती है तो किसी कुसुमाग्रज की कविताओं से निर्झर की भांति बहती है। फिल्म संसार भी रुपहले परदे का आधुनिक नाट्य शास्त्र है, जिसमें विभिन्न पात्रों, चरित्रों का अभिनय करने वाले एक सार्वजनिक दायित्व और सर्जना धर्म का पालन करते हैं। उनमें भी अच्छे और कम अच्छे उसी तरह मिलतें हैं जैसे जीवन के अन्य क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति है। और उसी परिमाण में उनको यश मिलता है-कम, बहुत कम, या बहुत अधिक। उदहारण के लिए मैंने अमिताभ बच्चन की अधिकांश फिल्में पसंद नहीं की, केवल कुछ अपवाद रहीं जैसे सात हिन्दुस्तानी, अभिमान, आनंद, कभी-कभी, या फिर शोले। पर जीवन के उत्तरार्द्ध के अमिताभ बेहद परिपक्व और भारतीय जीवन मूल्यों को अपने परिवार से अभिव्यक्त करने वाले ऐसे प्रतीक बने जिनका समाज के बहुत बड़े वर्ग पर प्रभाव पड़ता है। एक ऐसे समय जब बॉलिवुड में दुबई के धन और मन का बहुत बड़ी मात्रा में असर बढ़ता दिखता है, यदि अमिताभ और रितिक रोशन आशा दिलाते हैं तो उसी तरह राजेश खन्ना ने अपने वक्त की अच्छी फिल्मों द्वारा हमें रोमांचित और अनुरंजित किया। यही वह सृजनशीलता है जो हमें उनके स्मरण की और प्रवृत्त करती है, उनको हमारे सम्मान का अधिकारी बनाती है।

राजेश खन्ना अपनी शैली के स्वयं सर्जक थे। देवानंद और दिलीप कुमार के बाद राजेश खन्ना का फिल्मी अंदाज देश के लाखों नौजवानों का अंदाज बन गया। उनकी हेयर स्टाइल, चेहरा तिरछा और मूंदी आंखों से मुस्कुराहट का जलवा, शर्ट पहनने का तरीका और आनंद में जिंदगी की पहेलियों को बुझाने का वह करिश्माई उदासी में लिपटा आशावान अभिनय बच्चों, बूढ़ों और नौजवानों को सम्मोहित करता ही गया। राजेश खन्ना अभिनय, सफलता और लोकप्रियता के विराट आकाश के वह नक्षत्र बन गये जहां हर किसी के लिए पहुंचना संभव नहीं है। फिर उनके बारे में निहायत अच्छी बातें भी कही गयीं और उनके अखड़पन और बेपरवाह और बेलाग अंदाज ने उनको जीवन के संध्याकाल में एकाकीपन का अहसास भी कराया।

वे चाहे राजनीति में रहे या अभिनय के क्षेत्र में, हर जगह उनके पांव यशोभूमि को छूते रहे। पर न कभी उन्होंने संक्षिप्त राजनीतिक करियर में किसी की परवाह की ना बॉलिवुड में। राजेश खन्ना यानी सिर्फ अपनी और सिर्फ अपनी शर्तों पर जीना। आपको मंजूर है तो ठीक है नहीं तो......।

ये बात बहुतों को नागवार गुजरती थी, पर हमारी जिंदगी में बहुत से सितारे स्वयंभू होते हैं। अगर कोई एक उदाहरण देना हो जिससे राजेश खन्ना के इस अंदाज की तुलना की जा सकें वह शायद राजकुमार होंगे या दक्षिण के एम.जी. रामाचन्द्रन।

राजेश खन्ना ने हर तरह की फिल्में की। सब नहीं चलीं लेकिन जो चलीं वो अमर हो गयीं। यह ठीक है कि उनकी सफलता और लोकप्रियता में सलिल चौधरी जैसे महान संगीतकारों का बहुत बड़ा योगदान रहा लेकिन रिद्म, लय, शब्द की जादूगरी को अपनी अपूर्व नये अंदाज के अभिनय से अभिव्यक्त कर उनमें जान फूंकना तो राजेश खन्ना का कमाल होता था।

आनंद में ‘बाबू मोशाय’ को कहने का अंदाज आज भी रोमांचित करता है और जिंदगी कैसी है पहेली तथा कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना जैसे महीन और अंतरंग भावनाओं के उतार-चढ़ाव को अभिव्यक्त करने वाले गीतों को जीना बहुत कम अभिनेताओं की वश में होता है। और फिर दार्जीलिंग की पहाड़ियों में गाड़ी चलाते हुए शर्मिला टैगोर को रेल में पुकारते हुए ‘मेरे सपनों की रानी’ गीत ने एक नई पीढ़ी को झूमकर सड़कों पर उतार दिया था। अमर प्रेम, कटी पतंग, आराधना, प्रेम कहानी, खामोशी और बावर्ची हर वक्त और हर पीढ़ी को आज भी स्पंदित और रोमांचित करने में समर्थ है। सफर में जीवन से भरी तेरी आंखें और खामोशी में ‘वो शाम कुछ अजीब थी,’ जैसे गीतों से उनका अभिनय हमें बार-बार उदासी के चांद और भीगी आंखों के लम्हे दे जाते हैं और कौन सा ऐसा बच्चा होगा जो हाथी मेरे साथी में राजेश खन्ना का लाजवाब चुलबुला अभिनय भुला पाया हो, जब उन्होंने ‘चल चल मेरे हाथी, चल मेरे साथी, तू ले चल खटारा खींचके’ गाया था। खामोशी बॉलिवुड में अपनी किस्म की पहली और रंगीन फिल्मों की बाढ़ में श्वेत श्याम फिल्म थी जिसमें वहीदा रहमान के साथ राजेश खन्ना ने जो अभिनय किया उसने गुरुदत्त की याद दिला दी। नंदा के साथ द ट्रेन भी अपनी युग की ट्रेल ब्लेजर फिल्म बनी। सच्चा झूठा में मुमताज के साथ राजेश खन्ना का गाया गीत मेरी प्यारी बहनियां बनेगी दुल्हनियां आज भी हर शादी के उत्सव का अनिवार्य हिस्सा है। ‘इत्तफाक’ में यदि रहस्य और रोमांच का मंजर था ‘आज का एम.एल.ए. राम अवतार भारतीय राजनीति के गंदला गये, सडांध भरे स्वरूप् पर अपने वक्त की तीखी मार थी। मुमताज के साथ दुश्मन और दो रास्ते गजब की सुपरहिट थी। ‘बिंदिया चमकेगी’ और ‘छुप गये सारे नजारे’ इतना चले कि उसे अकल्पनीय ही कहा जाएगा।

उनकी जिंदगी के अनेक पहलू संघर्ष, गरीबी और एकाएक आई समृद्धि, गजब के उभार, बिछोह और बदमिजाजी से युक्त है। अपने जमाने की सुपर स्टार हीरोइन डिंपल कपाड़िया के साथ विवाह एक अलग पक्ष है। एक पक्ष यह भी है कि तमाम अवरोधों के बावजूद न केवल डिंपल ने नई दिल्ली के चुनाव में राजेश का साथ दिया बल्कि जीवन के संध्याकाल में राजेश खन्ना वह सहारा और आत्मीयता की उष्मा बनीं जिसने निश्चित रूप से उनका इस दुनिया से जाना भींगी पलकों और मंद मुस्कान के साथ हुई विदाई में मुलायमियत से तब्दील कर दिया।

पिछले कुछ वर्षों से राजेश खन्ना मानो निर्वात में खो गये थे। वे इस बात के प्रतीक हैं कि मृत्यु जिंदगी की तमाम गुत्थियों का समाधान दे देती है। उनके जाने पर बॉलिवुड में सन्नाटा टूटा और अचानक यूं लगा कि सुपर स्टार राजेश खन्ना अभी-अभी फिल्म फेयर पुरस्कार के मंच से हर दिल को अपने अंदाजे बयां से अपनी कशिश में बांधते हुए गुजर गये। इसका केवल एक अर्थ है कि जिन्दा सिर्फ एक ही चीज रहती है और वो है आपकी अच्छी कृति। कला का धर्म जी भर का जिया तो जिंदगी की पहेलियां भी हल हो जाती हैं। राजेश खन्ना सिर्फ सुपर स्टार ही नहीं थे वे अपने आपमें बॉलिवुड की पाठशाला बन गये।

रविवासरीय हिंदुस्‍तान, 22 जुलाई 2012


शशि शेखर द्वारा राजेश खन्‍ना को इस रूप में याद किया गया


सुपर स्टार होने का अर्थ

कुछ महीने पहले टेलीविजन पर विज्ञापन देखा- एक कृषकाय व्यक्ति डायलॉग बोल रहा है- ‘मुझसे मेरे ‘फैन्स’ कोई नहीं छीन सकता बाबू मोशाय।’ शरद जोशी के नाटक के संवाद से मिलता-जुलता भाव मन में उभरा- समय किसी भी सुपर स्टार से बड़ा होता है। संवाद बोलने वाले कोई और नहीं राजेश खन्ना थे, पर मुझे वह विज्ञापन रुचिकर नहीं लगा। क्यों?
शायद इसलिए कि हम अक्सर मन में कुछ छवियों को इतने गहरे तक जगह दे देते हैं कि उन पर वक्त की जरा-सी धूल बर्दाश्त नहीं होती। मुझे याद है। बरसों पहले हम किसी हस्ती के यहां गए थे। उनकी पत्नी कभी मशहूर मॉडल और हीरोइन हुआ करती थीं। मैं उनसे मिलना चाहता था, पर तमाम इसरार के बावजूद वह बाहर नहीं निकलीं। बाद में पति महोदय ने बताया कि वह बिना मेकअप अपने दायरे से बाहर निकलना पसंद नहीं करतीं। उस दिन जब राजेश खन्ना को पंखे के उस विज्ञापन में देखा, तो मुझे हिंदी सिनेमा की वह पूर्व नायिका समझदार लगने लगी थी। मेकअप के बिना उनको देखना, यादों में स्थापित छवि को खंडित करना था। ‘सुपर स्टार’ की कृषकाया इसीलिए कष्टकारी थी, पर ‘फैन्स’ वाला डायलॉग गलत नहीं था। गए गुरुवार को राजेश खन्ना की अंतिम यात्रा में जो भीड़ उमड़ी, वह इस बात की तस्दीक करती थी कि उनके ‘फैन्स’ को उनसे कोई नहीं छीन सकता।
मैं राजेश खन्ना से कभी नहीं मिला, पर उनका मेरे जीवन में अहम हिस्सा है। पांचवीं या छठी कक्षा की बात है। किशोर होने की अनुभूति मन में पंख खोलने लगी थी। बगल के घर में दो दीदियां रहती थीं। दोनों की दोनों राजेश खन्ना की जबर्दस्त फैन। एक दिन देखता क्या हूं कि साप्ताहिक हिन्दुस्तान  में राजेश खन्ना की बड़ी-सी तस्वीर छपी है और उनमें से एक दीदी निहारते-निहारते फोटो को अपने होठों से लगा लेती है। यकीन जानिए, उस तरह की जलन का अहसास उससे पहले कभी नहीं हुआ था। यह तो राजेश खन्ना के जादू की हलकी-सी झलक है। महिलाओं में किसी स्टार के प्रति ऐसी जानलेवा दीवानगी बाद में कभी नहीं देखी गई।
हमारी पीढ़ी के लोग उनकी फिल्मों को देखते और गाने गुनगुनाते बड़े हुए। इनके बहुत से शब्द मुहावरे की मानिंद हम लोगों के दिल-ओ-दिमाग में पैबस्त हो गए थे। हालांकि, हम उनका अर्थ भी नहीं जानते थे। रूप कैसे मस्ताना हो सकता है या प्यार क्यों दीवाना हो सकता है, या फिर किसी को सपनों की रानी भी कहा जा सकता है? ऐसे प्रश्न उनकी फिल्मों के गानों को सुन-सुनकर मन में उमड़ते-घुमड़ते थे। जवाब के लिए अपनी उम्र का इंतजार करना था।
उस वक्त वह करियर के एवरेस्ट की ओर थे, बॉलीवुड की छत पर कब्जा करना आसान नहीं था। वह समय हिंदी सिनेमा की शास्त्रीय तिकड़ी का था। एक तरफ ‘ट्रैजिडी किंग’ दिलीप कुमार थे, दूसरी तरफ ‘ग्रेट शोमैन’ राजकपूर और तीसरी ओर ‘सदाबहार’ देवानंद। यह त्रिमूर्ति ऐसा पैकेज थी, दर्शक जिसके बरसों-बरस से अभ्यस्त थे। बाकी सारे लोग इनकी नकल करके अपना काम चलाते थे। राजेंद्र कुमार को ‘जुबली कुमार’ जरूर कहा जाता था, पर इस त्रिमूर्ति के सामने उनकी आभा धुंधली लगती थी। बहुतों को वह दिलीप कुमार की नकल लगते थे। इसीलिए उन्हें ऐसे निर्माताओं का प्रश्रय हासिल होता था, जिनसे यूसुफ साहब किसी न किसी तरह दूरी बनाकर रखते थे। राजकपूर संगम में दिलीप को लेना चाहते थे, वह नहीं मिले, तो राजेंद्र कुमार से काम चला लिया।
यह भी मत भूलिए कि उस समय न इतनी फिल्में बनती थीं, न देश-विदेश में ऐसा विशाल दर्शक वर्ग होता था। न ही स्थापित लोग किसी नौजवान के लिए रास्ता छोड़ने के लिए तैयार थे। लता मंगेशकर के विरोधी आरोप लगाते हैं कि उन्होंने न केवल सैकड़ों प्रतिभावान गायिकाओं की राह रोकी, बल्कि अपनी सगी बहनों के रास्ते में भी रोड़े अटकाए। ऐसे माहौल में अमृतसर में जन्मे इस नौजवान के लिए रास्ता बनाना बेहद कठिन था, पर धुन के पक्के काका अभिनय की नई किताब लिखने को आतुर थे।
एक बार फिल्मों के किसी जानकार ने बताया था कि शुरुआती दिनों में निर्देशक ने उनसे कहा कि मां के लिए एक डायलॉग बोलिए। राजेश खन्ना का सवाल था कि मेरी मां की भूमिका निभाएगा कौन? जवाब में सवाल मिला, इससे आपको क्या मतलब? आप तो बस कल्पना कीजिए और संवाद बोल दीजिए। राजेश खन्ना ने उन्हें समझाया था- यह जानना बेहद जरूरी है, क्योंकि हर अभिनेत्री की अपनी एक स्टाइल होती है। उसके बच्चे में भी उसका अंश झलकना चाहिए। अभिनय के विद्यार्थी अगर इस प्रकरण के बारे में न जानते हों, तो इसे कृपया याद कर लें, जीवन भर उनके काम आएगा।
इंसानी व्यवहार की इसी बारीक समझ ने उन्हें अपने व्यक्तित्व और अभिनय में ऐसा कॉकटेल बनाने में मदद की, जो दिलीप, देव और राजकपूर की त्रिमूर्ति का मिश्रण था। उन्होंने चाल-ढाल और अदाओं में देवानंद को पछाड़ा, तो अनेक हास्य भूमिकाओं में राजकपूर और दिलीप कुमार की बराबरी की। आप आनंद के दृश्य याद कीजिए। हास्य, करुणा और चपलता के तमाम भाव एक के बाद एक मिल जाएंगे। अपनी असल जिंदगी में भी राजेश खन्ना ने उन लोगों का साथ कभी नहीं छोड़ा, जो उनके करियर में मददगार साबित हुए थे। किशोर कुमार का करियर जब ढलान पर आया, तो राजेश खन्ना ने तमाम संगीतकारों से गुजारिश की कि वह सिर्फ उनकी ही आवाज का इस्तेमाल करना चाहेंगे। आरडी बर्मन के भी छांव भरे दिनों में काका उनके साथ नजर आते थे। हर निर्माता से उनका आग्रह होता था कि वे गीत आनंद बख्शी से लिखवाएं, जबकि उन दिनों उर्दू शायरी के तमाम दिग्गज फिल्मी बाजार में बोली के इंतजार में खड़े थे।
जो शख्स दूसरों का इतना मददगार था, उसे अपनी जिंदगी के अंधेरों में वैसी मदद नहीं हासिल हुई, जिसकी दरकार थी। अस्सी के दशक में अपनी दूसरी पारी के अवसान के बाद वह राजनीति में आए, चुनाव भी जीता पर बॉलीवुड के सहयोगियों और सियासत के महारथियों में जमीन-आसमान का अंतर होता है। मुझे नहीं लगता कि राजेश खन्ना सियासत सुखी मन से छोड़कर गए। अब सिर्फ राजनीति ही क्यों, परिवार, सिने जगत और निजी रिश्तों में उन्हें तमाम बार ऐसा ही अहसास हुआ।
यह अलग बात है कि हम राजेश खन्ना को हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार के रूप में जानते रहे हैं, जानते रहेंगे। पता नहीं ‘आनंद’ की तरह उनकी गिरती हालत ने पहले से संकेत दिया था या नहीं कि सांसों का सिलसिला थमने वाला है? उस फिल्म का आखिरी संवाद याद आ रहा है - बाबू मोशाय,..जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ है जहांपनाह। उसे न तो आप बदल सकते हैं, न मैं। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिसकी डोर ऊपर वाले की उंगली से बंधी है। कब, कौन, कैसे उठेगा, ये कोई नहीं बता सकता है।
यकीनन, ‘आशीर्वाद’ से अंतिम विदा लेने के बाद बैकग्राउंड से इस तरह का डायलॉग नहीं सुना गया होगा, पर यह सच है कि कुछ लोग रंगमंच की कठपुतलियों का रोल अदा करते-करते उनमें ऐसे प्राण फूंक देते हैं कि इतिहास बन जाता है। राजेश खन्ना उनमें से एक थे।